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जिंदगी का संघर्ष ( अंत)

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"इतनी मेहनत, इतने सपने और अपनों के लिए वो अटूट प्यार... सुजल ने अपनी आखिरी सांस तक अपनी ज़िम्मेदारी निभाई। नियति के आगे इंसान बेबस हो जाता है, पर कुछ लोग जाकर भी कभी खत्म नहीं होते। 'सफर छोटा सही, मगर वो शान से जिया, खुद को मिटा कर भी, वो अपनों का जहां रौशन कर गया।' (समाप्त)"  इसी के साथ मेरी इस कहानी का अंत होता हे

जिंदगी का संघर्ष (भाग 11- एक रहस्य)

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प्रतीक घर की अलमारी में कुछ ढूंढ रहा था। सामान इधर-उधर हटाते वक्त अचानक उसकी नजर पिता सुजल की एक पुरानी डायरी पर पड़ी। प्रतीक ने कपटी उंगलियों से उसे डायरी को खोला। पन्ना पलटते ही उसकी नजर पहली लाइन पर पड़ी-और उसका दिल जोर से धड़क उठा। उसे एक लाइन ने जैसे उसके मन में हलचल मचा दी। एक अजीब सी घबराहट के मारे उसने तुरंत डायरी बंद की और चुपचाप उसे वापस वही रख दिया। उसे सच का पूरा सामना करने की हिम्मत अभी उसमें नहीं थी। कुछ महीनो बाद.... सुजल के जाने के बाद अनुकंपा के आधार पर प्रतीक को सरकारी अध्यापक की नौकरी मिल गई और उसकी पोस्टिंग एक दूसरे स्कूल में हुई। कहने को तो परिवार को एक आर्थिक सहारा मिल गया था। लेकिन पिता को खोने के उसे गहरे दुख के सामने इस नौकरी की कोई खुशी नहीं थी। प्रतीक उम्र और तजुर्बे के उस मोड़ पर था जहाँ वह खुद इतना समझदार नहीं हुआ था कि पूरे घर का बोझ उठा सके। लेकिन हालात ने उसके कंधों पर एक बड़ी जिम्मेदारी डाल दी थी। मन में कई झिझक ओर घबराहटे थी,फिर भी उसने खुद को संभाला,और चुपचाप नई जिम्मेदारियों को स्वीकार कर लिया- केवल अपने परिवार को संभालने के लिए। आगे जानन...

जिंदगी का संघर्ष (भाग 10- सुजल के बिना अधूरी खुशियां)

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 सुजल के जाने के बाद बहुत मुश्किल से घर खर्च चलाया मनु ने हालांकि उसकी नौकरी की वजह से पैसे मिले थे कुछ लेकिन वह भी लोनचुकाने में चले गए।सुजल ने वह लोन दो वजह से लिया था एक तो उसके गर के पास ही के जमीन थी जिसे सुजल खरीदना चाहता था लेकिन उसकी छोटी भाभी ने उससे कहा कि आपके तो एक ही पुत्र है लेकिन मेरे तीन बेटे है में उन्हें पास में ही रहते देखना चाहती हु ये जमीन मुझे लेने दो ।ओर दूसरी वजह जब सुजल के पिता जीवित थे तब भावेश ने एक जमीन बेचने की बात कही और इस बात से सुजल के पिता बहुत घबरा गये थे तो सुजल ने वह जमीन अपने ही भाई से खरीद ली। सुजल के जाने के बाद पूरा परिवार इस बात को धीरे धीरे भूल गया लेकिन सुजल की पत्नी मनु और बच्चों को सुजल की कमी हमेशा खलती थी।लेकिन वे किसी न किसी तरह उसके बिना इस जीवन को जी रहे थे उस दिन सुजल की साँसों के साथ मनु,पारो और प्रतीक की खुशियां आजादी भी चली गई। आगे क्या होगा जानने के लिए मुझे फॉलो करे और कमेंट करे कैसा लगा आज का भाग। भाग 11 शाम 7 बजे। https://pratikshadiary.blogspot.com/2026/08/9.html

जिंदगी का संघर्ष ( भाग 9- अंतिम सांसें और टूटता विश्र्वास)

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और पारो भी अपने पिता के पास ही रहती थी। नैना भी उससे मिलने आती थी लेकिन वह अंधविश्वासी थी। एक रात 7 बजे सुजल बैठा था उसके पास उसका पूरा परिवार था बहने भाई और उनकी बेटियां सब थे और अचानक उसकी तबियत खराब होने लगी वह बहकी बहकी बाते करने लगा मनु उसे ऐसे देखकर रोने लगी पूरी रात सभी उसी के पास थे प्रतीक ओर मनु ने बहुत कहा इन्हें अस्पताल ले जाते है लेकिन किसी ने उनकी बात पर गौर नहीं किया सुबह सुजल को अस्पताल ले जाया गया लेकिन वहां उनसे कहा गया कि या तो इन्हें गर ले जाइए या बड़े अस्पताल।सुजल को फिर घर ले आए अब सुजल बस लेटे हुए हाथ पैर हिला रहा था न ही तो आंखे खोल रहा था और न ही कुछ बोल रहा था ।सभी उसके पलंग के पास बैठे हुए थे और मनु पलग के पास नीचे लेट गई । जब से सुजल बीमार हुआ था तब से मनु सही से सो नहीं पाती थी इतने दिनों की थकान के कारण उसे नींद आ गई लेकिन पारो उसके पिता के पास ही बैठी थी वह सबकुछ देख रही थी कि उसकी बुआ अंधविश्वास के कारण क्या क्या कर रही है कि उसकी पिता की मृत्यु आसानी से हो जाए।फिर पारो ने देखा कि उसके पिता की सांसे जोर से चलने लगी और अचानक रुक गई नैना ने इशारा किया कि सुज...

जिंदगी का संघर्ष (भाग 8 - प्रेम ओर त्याग )

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समय के साथ चीजें ठीक होने लगी पर भावेश उसके हिस्से की जमीन को बेचने की बात करने लगा। लेकिन सुजल ने साफ मना कर दिया और कह दिया कि मैं मेरे पिता की जमीन नहीं बेचने दूंगा। भावेश ने हर मुमकिन कोशिश की पर कागजात न मिलने की वजह से उसका जमीन बेचने का प्रयास पूरी तरह नाकाम रहा। सुजल ने पिता के जाने के बाद पूरे परिवार को सम्भाल के रखा,पर कौन जानता था कि बहुत दूर का सोचना भी इंसान के लिए सही नहीं होता है। सुजल के पिता की मृत्यु के कुछ महीने पहले ही सुजल को पता चल चुका था, की उसे एक गंभीर बीमारी है। सुजल को अक्सर लोग रोज मिलने आते थे। और सुजल के पिता हमेशा परिवार वालों से पूछते कि ये लोग क्यों आते हैं,पर किसी ने उन्हें सच नहीं बताया था। सुजल लोगो से अधिक लगाव रखता था। सुजल कभी किसी के भी काम को न नहीं कहता था। उसे चेतन और उसके बाकी सारे करीबी दोस्त मिलने आते थे।सुजल को पहले तो ये लगता था कि वह जल्दी ही ठीक हो जाएगा। उसने बहुत कोशिश की अच्छे से अच्छे अस्पताल में खुदका इलाज करवाया। और काफी हद तक उसकी तबियत ठीक हो गई थी और डॉक्टर ने भी कह दिया था कि उसका ऑपरेशन हो जाएगा और वो पहले जैसा ठीक हो जाएगा।...

यादों की छाँव (एक हिंदी कविता )

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पापा, आपकी हँसी से मेरा हर ग़म मिट जाता था, एक वक्त था जब मेरे सर पर तेरा साया था। फिर कभी धूप भी लगती, तो सुकून आ जाता था, आपके सहारे के बिना तो चला भी नहीं जाता था। ज़िंदगी के हर तूफ़ान में, तेरा ही तो हौसला काम आता था, दूर आपसे एक पल भी नहीं रहा जाता था। आपका ख़याल ही तो मुझे हमेशा सताता था, फिर भी आपकी यादों का दीप, मेरे दिल में सदा जगमगाता था। ऐसी और कविताओं के लिए फॉलो करे।

जिंदगी का संघर्ष (भाग 7- अंतिम विदा और नया सवेरा)

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वक्त बीत रहा था। सुजल को भी काफी अच्छी तनख्वाह मिलने लगी थी अभी और पंकज की मौत को भी दो-तीन साल हो गए थे धीरे-धीरे पंकज की मौत के बारे में भूल रहे थे, की सुजल के पिता बीमार रहने लगे। सुजल ने उन्हें अस्पताल मैं दिखाया और समय पर दवाइयां दी पर कुछ खास असर नहीं हुआ। उनकी तबीयत और ज्यादा खराब रहने लगी। यहाँ तक की डॉक्टर ने भी कह दिया कि अब ये ज्यादा दिन नहीं रह पाएगे। उनकी तबीयत दिन दिन खराब हो रही थी पूरा परिवार उनकी सेवा कर रहा था।एक दिन सुजल के पिता को सब मिलने आये थे।भावेश की दोनों बेटियां ,पंकज की दोनों बेटियां ,सुजल की दोनों बहने भी। इतने लोगों की वजह से पारो पूरे दिन उसके दादाजी के पास नहीं जा पाई। फिर शाम को 6 बजे जब पारो अपने दादाजी के पास गई तो उन्होंने उसे पहचाने से इनकार कर दिया। इस बात से पारो को बहुत दुख हुआ ,वह अंदर ही अन्दर टूट गई। उसने सोचा कि दादाजी जिससे सबसे ज्यादा प्यार करते थे ,उसे ही भूल गए। पारो मन में ही रो रही थी कि उसने सुना कि उसके दादाजी की सांसे नहीं चल रही है। सुजल के पिता की मृत्यु हो गई। उनकी आत्मा ने इस दुनिया से विदा ले ली। जब सुजल की माता का देहांत हुआ था...