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जिंदगी का संघर्ष (भाग 6- जब सब कुछ बिखर गया)

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 मां के चले जाने के कुछ समय बाद ही एक और दुखद हादसा हुआ। सुजल के भाई पंकज न आत्महत्या कर ली। कोई नहीं जानता था कि उन्होंने ऐसा कदम क्यों उठाया, शायद वजह यह थी कि वह नशे का शिकार थे। पंकज का परिवार और सुजल व परिवार के बाकी सदस्य सदमे में डूब गए। समय बिता और सुजल अपने बच्चों को बेहतरीन शिक्षा देने लगा। जवान बेटे की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण सुजल के पिता बीमार रहने लगे। सुजल के पिता के दिल के सबसे करीब था प्रतीक। इस बात से पूरा परिवार जलता था और नैना अक्सर अपने पिता से कहती"आपके सिर्फ एक ही पोता नहीं है जो दिन भर उसी का नाम लेते हो"। और फिर प्रतीक की विद्यालय की पढ़ाई पूरी हुई तो सुजल ने उसे शहर कॉलेज दिया। अब सुजल के पिता के करीब पारो रहने लगी। एक वजह यह भी थी कि कुशल अक्सर पिता से कहता था कि आपकी उमर हो गई है ये मत करो वो मत करो और कुशल के बच्चे भी छोटे थे तो वो अपने दादाजी की बातों को समझ नहीं सकते थे।  "यादों के पन्नों में छुपा एक आशियाना है  कुछ चले गए दूर, कुछ को दूर पढ़ाई के लिए जाना है। सूने कमरे में बैठी पोती थामे दादा का हाथ, आँखों में नमी है, पर दिल में अपनों ...

जिंदगी का संघर्ष (भाग 5 - बंटवारा और स्वाभिमान)

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और भगवान ने उसकी सुन ली । उसने अपनी बेटी का नाम पारो रखा। फिर दिन अच्छे से बीतने लगे और तब तक कुशल के नौकरी लग गई थी और सुजल भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में सक्षम हो गया था। ऐसे ही कुछ वर्ष और बीत गए फिर कुशल की शादी कर दी गई लक्ष्मी से। शादी के 1 वर्ष बाद उनका बेटा हुआ हर्ष। फिर वक्त बदला और घर की शांति को किसी की नजर लग गई। एक दिन कुशाल ने अपने माता-पिता से साफ कह दिया "सुजल भैया तो कुछ कमाते नहीं है और पूरा घर मेरे ही पेसो से चलता है! अब उन्हें इस घर से अलग कर दीजिए"। घर का बटवारा तो हो गया, लेकिन सुजल का स्वाभिमान अंदर तक टूट गया। वह इस बात से दुखी होकर काफी दिनों तक मनु से भी उदास और नाराज रहने लगा। पर मनु ने हर कदम पर सुजल की हिम्मत बांधे रखी। धीरे-धीरे दिन बीतने लगे सुजल अपने काम में मन लगाने लगा और मनु गृहस्थी संभाले हुए थी। दोनों बच्चे विद्यालय में पढ़ते थे। इस बीच कुशल के घर एक बेटी ने जन्म लिया वह सुजल के घर के पास ही रहने आ गया। सुजल का दिल बहुत बड़ा था, उसने पुरानी सारी कड़वाहट को भुला दिया और कुशल के परिवार के साथ फिर से पहले की तरह प्यार से रहने लगा। इस...

जिंदगी का संघर्ष (भाग4 - घर परिवार और माँ की बीमारी)

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एक दिन सुजल की माता बीमार हो गई। घर का काम उसकी माता ही करतीं थी, उसका परिवार बड़ा था। वे चार भाई थे। सबसे बड़ा था भावेश, उसके 7 बच्चे थे और वह अब अलग रहता था। दूसरा था पंकज,वह रहता परिवार के साथ ही था और उसके 5 बच्चे थे। तीसरा था सुजल और चौथा था कुशल सबसे छोटा जो पढ़ाई कर रहा था। सुजल की छोटी भाभी घर का ज्यादा काम नहीं करती थी तो काम सुजल की माता को करना पढ़ता था। सुजल जानता था मां का ख्याल मनु ही रख सकती है। उसने भावेश से जाकर कहा। सुजल - मां की तबीयत बहुत खराब है। घर का काम कौन करेगा, आप जाकर मनु को ले आइये और उसके पिता से जाकर बात करिए इस बारे में। भावेश - ठीक है मैं कल ही जाता हूं। अगले दिन ही भावेश वहां गया और मनु को भेजने की बात रखी। मनु के पिता ने कह दिया कि अगली बार ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए तो भेज दूं। भावेश ने बात मान ली और मनु को घर ले आए। मनु घर आने के बाद घर का सारा काम करती थी, पर फिर भी उसे पहले जैसे ही तानें मिलते थे। लेकिन उसने अब माता-पिता से कहना छोड़ दिया। कुछ वर्ष और बीत गए। मनु फिर से मां बनने वाली थी, घर वाले चाहते थे की एक और लड़का हो जाए। लेकिन सुजल को बेटी चाहि...

घुटन(anxiety)

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सीने में दबा कर दर्द, चेहरे पर मुस्कान रखते हैं, यह घुटन सी ज़िंदगी में, हर रोज़ नया इम्तिहान देते हैं। ना सहने वाला दर्द सहा है क्या... जो कहना चाहता था तू किसी से कहा है क्या। मै जानती हु कोई सुनने वाला नहीं होगा... तू अपनो के बीच पराया बनके रहा है क्या। ऐसी और कविताओं के लिए मुझे फॉलो करे।

जिंदगी का संघर्ष (भाग 3 - जिम्मेदारियों का बोझ)

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कुछ वर्ष बाद जब सुजल 26 वर्ष का हुआ तो उसकी शादी मनु साथ हुई। मनु और सुजल उनका रिश्ता बचपन में ही हो गया था। शादी के बाद सुजल पर एक और जिम्मेदारी आ गई थी।, उसकी पत्नी की। सुजल ने दिन में 4 जगह ट्यूशन देना शुरू किया, वह सुबह जाता था और सीधा शाम को घर आता था खड़े खड़े ही खाना खाकर वापस चला जाता। और जब उसका यह कार्य पूरा हो जाता तो रात के 2:00 तक पढ़ाई करता। सुजल की इस निष्ठा की वजह से उसे एक विद्यालय में लगाया गया जहां महीने के ₹6000 मिलते थे। सुजल को राहत मिलने ही वाली थी, कि उसके पुत्र हुआ जिसका नाम रखा गया प्रतीक। अब सुजल के सिर पर कई जिम्मेदारियां थी, वह विद्यालय में भी जाता पढ़ाने और शाम को ट्यूशन पढाने भी जाता था। सुजल के घर वाले मनु से हमेशा बहस करते थे और सुजल हमेशा घरवालों की बात को सच मानता था। और मनु को बहुत कुछ सुनाता था। परिवार के इन झगड़ों से तंग आकर मनु के पिता उसे और प्रतीक को अपने घर ले गए। साल भर बीत गया पर मनु वापस नहीं आई और ना ही कोई उसे लेने गया। और सुजल की बड़ी बहन नैना कुछ और ही करना चाहती थी। नैना - तुम्हें कोई जरूरत नहीं है उस औरत को घर लाने की। सुजल...

एक पराया सा अपना स्कूल

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"इमारत तो आज भी वही खड़ी है ज़िद्दी सी, बस वो कल वाला हमारा बचपन कहीं खो गया..." जिन गलियारों में कभी अपनेपन का हक हुआ करता था, जहाँ कोई सुविधा ना होते हुए भी सब हुआ करता था। अतीत में कहाँ खो गई वो टीचर की डाँट... जिसमें कभी अपनापन हुआ करता था। ऐसी और कविताओं के लिए मुझे फॉलो करे।

सुकून का वह कोना

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कुछ पन्ने डायरी के, कुछ अधूरी सी बातें, भागती इस दुनिया में, सुकून की रातें। ढूँढता है दिल अक्सर वो पुराना कोना, जहाँ ना जीतने की होड़ थी, ना खोने का रोना। थोड़े से सपने हैं, थोड़ी सी उम्मीद, खुद से मुस्कुरा कर मिल लें, तो हर दिन है ईद। ऐसी और कविताओं के लिए मुझे फॉलो करे। और जिंदगी का संघर्ष कहानी जरूर देखे👇 https://www.blogger.com/blog/post/edit/849031829885086896/6511144217586283431