जिंदगी का संघर्ष (भाग 5 - बंटवारा और स्वाभिमान)
और भगवान ने उसकी सुन ली । उसने अपनी बेटी का नाम पारो रखा। फिर दिन अच्छे से बीतने लगे और तब तक कुशल के नौकरी लग गई थी और सुजल भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में सक्षम हो गया था। ऐसे ही कुछ वर्ष और बीत गए फिर कुशल की शादी कर दी गई लक्ष्मी से। शादी के 1 वर्ष बाद उनका बेटा हुआ हर्ष।
फिर वक्त बदला और घर की शांति को किसी की नजर लग गई। एक दिन कुशाल ने अपने माता-पिता से साफ कह दिया "सुजल भैया तो कुछ कमाते नहीं है और पूरा घर मेरे ही पेसो से चलता है! अब उन्हें इस घर से अलग कर दीजिए"।
घर का बटवारा तो हो गया, लेकिन सुजल का स्वाभिमान अंदर तक टूट गया। वह इस बात से दुखी होकर काफी दिनों तक मनु से भी उदास और नाराज रहने लगा। पर मनु ने हर कदम पर सुजल की हिम्मत बांधे रखी। धीरे-धीरे दिन बीतने लगे सुजल अपने काम में मन लगाने लगा और मनु गृहस्थी संभाले हुए थी। दोनों बच्चे विद्यालय में पढ़ते थे। इस बीच कुशल के घर एक बेटी ने जन्म लिया वह सुजल के घर के पास ही रहने आ गया। सुजल का दिल बहुत बड़ा था, उसने पुरानी सारी कड़वाहट को भुला दिया और कुशल के परिवार के साथ फिर से पहले की तरह प्यार से रहने लगा। इसी दौरान भावेश और पंकज ने भी अपने बेटे बेटियों का विवाह संपन्न करवा दिया।
सुजल की बरसों की अटूट मेहनत आखिरकार रंग लाई और उसकी एक बहुत अच्छी सरकारी नौकरी लग गई। घर की परिस्थितिया संभल गई, लेकिन नौकरी लगने के ठीक एक महीने बाद ही अचानक मां का देहांत हो गया। पर सुजल को इस बात का सुकून था कि उसकी मां उसे कामयाब देखकर गई।
आगे क्या होगा क्या उसकी जिंदगी में खुशियां रहेगी?
जानने के लिए मुझे फॉलो जरूर करे। भाग 6 शाम 7 बजे।
https://pratikshadairy.blogspot.com/2026/08/4.html
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